UTTARAKHAND ME PANCHAYATI RAAJ JILA BAGESHWAR KE MAHILA PRATINIDHIYON KE VISHESH SANDARBH ME
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TypePrint
- CategoryAcademic
- Sub CategoryReference Book
- StreamEducation
वर्तमान समय में अनेक लोगों की धारणा है कि पंचायतों में महिलाओं का आरक्षण दिया जाना उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ है। विभिन्न सेमिनार व संगोष्ठियों में प्रायः कहा जाता है कि महिलाएं, पुरुष पराधीनता की इतनी अभ्यस्त है कि पति की इच्छा से ही कोई कार्य कर सकती हैं वहां उनके पति वास्तव में निर्णय लेते हैं किन्तु इस प्रकार की निराशा जल्दबाजी की परिचायक हैं। ग्रामीण महिलाओं की राजनीति में भागीदारी की यह प्रारम्भिक एवं संक्रमणकालीन स्थिति है। यह समय अब दूर नहीं है जब महिलाएं स्वयं अपने दायित्वों को पूरी तरह समझ कर स्वतंत्र रूप से कार्य करेंगी। पंचायतों की महिला प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण हेतु आयोजित सम्मेलनों में महिलाओं की उपस्थिति व रूचि इसके प्रमाण हैं। स्वतन्त्रता के बाद भारत में पंचायती राज संस्थाओं का आरम्भ इस देह से किया गया कि भारत की 70 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या को स्वशासन का अधिकार प्राप्त हो सके किन्तु यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि 73वें संविधान संसोधन से पूर्व तक स्वशासन का अधिकार केवल पुरुषो को ही माना गया महिलाओं को नहीं। उत्तर प्रदेश उन आरंम्भिक राज्यों में से था जिन्होंने ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की ओर कदम उठाया तथा 1947 में संयुक्त प्रान्त पंचायत राज अधिनियम पारित किया तद्नुसार 7 दिसम्बर 1947 को गर्वनर जर्नल द्वारा हस्ताक्षरित हुआ व 15-08-1949 को पंचायतों की स्थापना की। इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 40 आने के पूर्व जिसके द्वारा ग्राम पंचायतों के गठन के सिद्धान्त की घोषणा की गयी, उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का जाल फैल चुका था। 1953 में पंचायती राज व्यवस्था के आरंभ में महिलाओं की सहभागिता का प्रावधान अल्प मात्रा में था। 1957 में बलवन्त राय मेहता की अनुशंसाओं द्वारा प्रत्येक समिति में महिला प्रतिनिधित्व के अभाव में दो महिलाओं को नामांकित करने का प्रावधान रखा गया। 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा पंचायती राज अधिनियम में महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित किये गये हैं। राज्य सरकार "रोटेशन पद्धति" से महिला वार्ड/महिला निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित किये गये है, महिला वार्ड या आरक्षित महिला निर्वाचन क्षेत्र से केवल महिला ही चुनाव लड सकेगी। पुरूष वार्ड से महिलायें चुनाव लड़ने के लिए स्वतन्त्र है। उत्तराखण्ड पंचायती राज अधिनियम, संशोधन बिल 2008 में विधान सभा द्वारा पास बिल पहला राज्य बन गया है जहाँ 50 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए तीनी स्तर पर दिये जाने का प्रावधान है। उत्तराखण्ड पंचायती राज अधिनियम में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण की व्यवस्था में महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी से पंचायती राज व्यवस्था को नया आयाम मिला है तथा ग्रामीण महिलाओं को विकास की प्रक्रिया से जोडा है। इससे सामाजिक नेतृत्व के गठन में एक नये दौर की शुरूआत हुई है। इस परिवर्तन से सामाजिक अन्यायों पर और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगने में मदत मिलेगी, दहेज, हत्या, वधू दहन और ऐसी दूसरी सामाजिक बुराईयों को नियंत्रण में लाने में सहायता मिलेगी, साथ ही महिलाओं की अधिकाधिक भागीदारी से उन्हें राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाने में मदद मिलेगी। प्रस्तुत पुस्तक पंचायती राज सिद्धान्त और व्यवहार बागेश्वर जिले के संदर्भ में (उत्तराखण्ड) को रख कर लिखा गया है। पंचायत स्तर पर 50 प्रतिशत महिला आरक्षण से स्थानीय स्वशासन में महिला की राजनीतिक सहभागिता व प्रतिनिधित्व जुडने से महिला की बहुआयामी प्रतिभा का लेखन हेतु महत्वपूर्ण हो गया है। पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण से राजनीतिक प्रतिनिधित्व व सहभागिता के साथ-साथ ग्रामीण महिला की परिवार व समाज में स्थित्ति व भूमिका को नये आयाम के माध्यम से देखने को मिला है तथा पंचायत स्तर पर 50 प्रतिशत महिला आरक्षण से जहाँ पर ग्रामीण महिलाओं की राजनीतिक प्रतिनिधित्व से समाज में नये आयामों की जुडने की पूरी संभावना है नये आयामों में निर्णय निर्माण, नीति निर्माण, नीतियों को कार्यान्वित में सहभागिता, पंचायत की बैठको का नेतृत्व व वित्त संबंधी महत्वपूर्ण मामलों से महिलाओं के नये नेतृत्व का उदय होना प्रासागिक रहा है।
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